Joiya history in world
जोईया राजपुत्र: जंगलदेश और दक्षिण पंजाब | राजपूत कुल सिपाहसालार_स
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जोहिया (जिन्हें जोया, जोइया, जोया,जोईया और जोया के नाम से भी जाना जाता है, उत्तरी भारत और पाकिस्तान में चंद्रवंशी राजपूत कबीले होने का दावा करते हैं। जाटों का भी जोहिया नाम का एक कबीला है।
जोईया या जोया उत्तरी भारत और पाकिस्तान का एक राजपूत वंश है। जोया चौबीस अविभाजित तथा जोड़या चौबीस अविभाजित राजपूत कुलों या एका में से एक हैं। प्राचीन कालक्रमों में उन्हें "जंगलदेश के भगवान" के रूप में वर्णित किया गया है, जो हरियाना, भट्टियाना, भटनेर और नागौर को समझने वाले एक मार्ग के रूप में है। उन्होंने दहिया के साथ भी, जिनके साथ उनका नाम हमेशा जोड़ा जाता है, सिंधु और सतलज के किनारे उनके प्रभाव में थे।
मूल:
जोइया की पहचान यौधेय या यौधेय गण से की जाती है जो एक प्राचीन आदिवासी संघ थे जो सिंधु नदी और गंगा नदी के बीच के क्षेत्र में रहते थे। पाणिनि की अष्टाध्यायी और गणपथ में इनका उल्लेख मिलता है। महाभारत, महामायुरी, बृहत् संहिता, पुराण, चंद्रव्याकरण और काशिका में उनके अन्य संदर्भ हैं। प्रारंभिक मध्ययुगीन काल के लेखन और 500 ईसा पूर्व से लेकर 1200 सीई तक यौधेयों के कालक्रम से संदर्भ फैले हुए हैं। वे लगभग 200 ईसा पूर्व से 400 ईस्वी तक अपनी शक्ति के चरम पर थे
जोइया और राठौर राजपूतः
राठौटों द्वारा जंगलदेश में उनके राज्य पर कब्जा करने से पहले, जोइया के शासन में छह सौ गांव थे। शेर सिंह उनका शासक था और भूरूप उनकी राजधानी थी और एक महान योद्धा था। उन्होंने राठौरों को कड़ी टक्कर दी। राठौड़ शासक राव बीका ने तब खुद को गोदाटा जाटों के साथ जोड़ लिया।
गोदारा जाट जंगलदेश पर शासन करने वाले जाटों के छह कुलों में सबसे शक्तिशाली थे। बीका ने गोदरस के साथ जोड़या पर हमला किया और उन्हें हरा दिया। राठौरों और जोयाओं के बीच सबसे बड़ा युद्ध सिद्धमुख के पास ढाका गाँव में लड़ा गया था। 16 वीं शताब्दी के मध्य में उन्हें मुगल सम्राट अकबर की मदद से राठौर शासकों द्वारा बीकानेर की जोइया राजधानी से निष्कासित कर दिया गया था। ऐन-ए-अकबरी, खंड ॥ खंड 195 के अनुसार, जोइया सिरसा के महलों (जिलों) में, हिसार फिरोजा की सरकार में और राजपुर, शेरगढ़, फतहपुर और कहटोर में बेट जालंधर दोआब की सरकार'
जालंधर दोआब की सरकार में प्रमुख जाति थी, जहां अर्ध स्वतंत्र फतहपुर (विहारी) राज्य की स्थापना राजा फतेह खान जोइया / जोइया ने की थी। बाद में दौलत खान जोयिया और उनके वंश (दौलताना) ने इस क्षेत्र और कहरोर पर 1754 तक शासन किया, जब अमीर मुबारिक खान अब्बासी ने विजय प्राप्त की और इस क्षेत्र को भावलालपुर राज्य का हिस्सा बना दिया। सिरसा में जोयास ने शासन किया और यहां तक कि राठौरों से भटनेयर को जीतने में भट्टियों की मदद की। भटनेयर का इतिहास हमें बताता है कि इस किले पर जॉयियास, चायल, भाटियों और राठौरों का शासन रहा है। हालांकि 1783 के महान अकाल के बाद,
इस रिक्तता को ब्रिटिश साहसी थॉमस कुक ने भरा था, जिन्होंने कुछ वर्षों तक इस क्षेत्र पर शासन किया और बाद में मराठों द्वारा लिया गया और अंत में अंग्रेजों द्वारा कब्जा कर लिया गया। जोईया (ज्यादातर हिंदू) अभी भी इस क्षेत्र में रह रहे हैं। मोती चंद जोईया हरियाणा विधानसभा में सांसद थे, जबकि मुस्लिम जोइया पाकिस्तान चले गए और पाकपट्टन और साहीवाल जिलों में बस
और साहीवाल जिलों में बस गए। फिरोजपुर जिले में हजरत सुल्तान महमूद जोयास की पवित्र दरगाह है और मुसलमानों और हिंदुओं द्वारा समान रूप से पूजनीय है।
इस्लाम में रूपांतरण:
जोहियाओं को 12वीं शताब्दी में जाने-माने सूफी संत हजरत बाबा फरीद शकर गंज द्वारा इस्लाम में परिवर्तित किया गया था, जिनकी दरगाह अजुधुन में है और जिनसे यह स्थान पाकपट्टन (पंजाब, पाकिस्तान में जिला) का आधुनिक नाम प्राप्त करता है, जिसका अर्थ है 'नौका शुद्ध लोगों की।
बाबा फरीद ने तीन जोइया भाइयों, लुनान, बेर और वसूल को इस्लाम में परिवर्तित कर दिया और लुना को लून, दुनान, चौ "लूनान की संतानें कई गुना बढ़ सकती हैं" कहकर आशीर्वाद दिया। इन भाइयों ने दिल्ली के गुलाम राजाओं से भटिंडा के किले पर कब्जा कर लिया और स्वतंत्र रूप से सिरसा और भटनेर के साथ अपने क्षेत्र पर शासन किया।
मध्य साम्राज्यों के दौरान जॉयसः
योधेय लोग सतद्रु (सतलज) नदी के तट पर बसे हुए थे, जो बाद में पंजाब (पाकिस्तान) के आज के प्रांत में बहावलपुर की रियासत का हिस्सा बन गया।
भारत में हरियाणा राज्य के रोहतक के सोनीपत किले में सतलुज और यमुना नदियों के बीच के क्षेत्रों में यौधेय वंश के सिक्के भी मिले हैं। इन सिक्कों पर संस्कृत में "यौधे गणस्य जय" लिखा होता है। यौधेय वंश महाभारत काल में भी अस्तित्व में था।
यौधेय या जोइया अपनी बहादुरी के लिए जाने जाते थे। उन्होंने गुप्त मौर्य और कुषाणों से युद्ध किया। उन्होंने मारवाड़, जोधपुर और जैसलमेर जैसे प्राचीन क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। राजस्थान। रंग महल उनकी राजधानी थी (भारत में गंगानगर के पास बर्बाद शहर) | रंग महल संस्कृति घग्घर घाटी में फैली हुई है और इसके चित्रित बर्तन हड़प्पा काल से काफी अलग हैं।
जोहिया राजपुत्रः जंगलदेश और दक्षिण पंजाब
जोया संप्रदायः
जोइया संप्रदायों की कुल संख्या लगभग 46 है। इनमें से अधिक महत्वपूर्ण भदेरा, लखवेरा, दौलताना, निहालका, गाज़ी खानाना और जलवान हैं, उनके पूर्वजों को एक मुस्लिम संत अब्दुल्ला जहानियन द्वारा नाइक-ओ-कार भाई या सदाचारी भाइयों के रूप में नामित किया गया था। जोइया संप्रदायों के अधिकांश नाम एक का या युग के साथ समाप्त होते हैं।
अन्य प्रमुख संप्रदाय हैं अकोके, भालाना, भट्टी, फिरोजके, हसनके, जागलेरा, झगडेके, जुगेके, लखुके, लंगाहके, लालेके, मिहुके, मुमुंके, पंजेरा, रानुके, सबुके, शेखुके, सनयेके, शाहबाके, अदमेरा, मलकेटा, साहुका ओट साल्देरा.
जोडया:
1. लखवाटा
2. शौक
3. दोलताना
4 ललिका
5. लुखोका
6. अकोका
7. मोमोका
8. सालदारा
9. गतारा
10. गाजीखाना
संदर्भ:
मजूमदार, आर सी (1977). प्राचीन भारत। मोतीलाल बनारसीदास. पीपी। 129-130, 2311 आईएसबीएन 97881208043641 ऊपर जायें ^ गुप्ता, परमानंद (1989)। प्राचीन भारतीय सिक्कों और मुहरों से भूगोल | कॉन्सेप्ट पब्लिशिंग कंपनी। पीपी। 20, 631 आईएसबीएन 9788170222484/ दासगुप्ता, केके ए प्राचीन भारत का आदिवासी इतिहास: एक न्यूमिज़माटिक दृष्टिकोण, कलकत्ता, 1974
लाहिड़ी, उत्तरी भारत के बेला स्वदेशी राज्य (लगभग 200 ईसा पूर्व - 320 एडी), कलकत्ता विश्वविद्यालय, 19741
एच एस भाटिया द्वारा वैदिक
समीप के राज्यों पर आक्रमण करना आरम्भ किया। जो राज्य पराजित हो जाते, उन पर वह अपना अधिकार कर लेता। उसके लगातार ऐसा करने से यहाँ के सभी राज्यों में उसका आतंक पैदा हो गया। वहाँ के छोटे-छोटे सभी राजा भयभीत हो उठे। ऐसे राज्यों को परास्त करके बीका ने अपने आपको शक्तिशाली बना लिया।
अपने अधिकार की सेना को प्रवल बनाकर और अपने राज्य का विस्तार करके वह महभूमि के जाटों के राज्यों को तरफ अग्रसर हुआ। जो लोग बहुत प्राचीन काल से वहाँ पर रहते आ रहे थे। वर्तमान बीकानेर राज्य का अधिकांश भाग पहले उन्हीं के अधिकार में था।
मरुभूमि में बहुत प्राचीन काल से जाट लोग निवासी थे और प्राचीन एशिया में जिवनी भी जातियाँ रहती थीं, उनमें इनकी संख्या बहुत अधिक थी। वे लोग अत्यन्त साहसी और पराक्रमी थे। योका के आक्रमण के दिनों में उनका राजा निर्वल पड़ गया था। ईसा की चौथी शताब्दी में पंजाब में जाटों का शक्तिशाली राज्य था। भारतवर्ष में आक्रमण के समय इन्हीं जाटों ने मुसलमानों का सामना किया था। सिंधु नदी को पार करके महमूद के आगे पढ़ने पर इन्हीं जाटों ने युद्ध करके अपने राज्य की रक्षा को थी और तैमूर के आक्रमण करने पर उसके साथ इन्हीं जाटों ने भयंकर संग्राम किया था बादशाह बाबर ने लिखा है" भारतवर्ष पर आक्रमण करने के लिए जब में आया था, उस समय जाटों ने मेरे साथ युद्ध किया था। पंजाब में इस्लाम का आतंक फैलने पर जाटों ने गुरु नानक के धर्म को स्वीकार किया और वे
अपना नाम जाट बदल कर सिक्ख हो गये।"
जाट जाति के लोग भारतवर्ष में आने के पहले एशिया के दूसरे भागों में रहते और जिट अथवा जट जाति के नाम से प्रसिद्ध थे। अपने प्राचीन स्थानों को छोड़कर ये लोग भारतवर्ष की मरुभूमि में कब आये, इसका कोई ऐतिहासिक आधार हमारे पास नहीं है। लेकिन यह निश्चित है कि जिन दिनों में राठौरों ने मरुभूमि के जाटों पर आक्रमण किया था, उस समय इस जाति के सामाजिक आचार और व्यवहार सीथियन लोगों के आचार-व्यवहार जैसे थे। इससे जाहिर होता है कि भारतवर्ष में आने के पहले इस जाति के लोग सीथिया में रहते थे और इनकी जाति सीथियन जाति को कोई एक शाखा थी। उन दिनों में ये लोग खेतों का काम करते थे। जाट जाति के लोग प्राचीन काल में एक देवी को पूजा करते थे।
अपने प्राचीन स्थानों से भारतवर्ष में आ जाने के बाद इन जाटों पर मुस्लिम साधु शेख फकीर ने अपने धर्म का प्रभाव डाला। उस समय इनके प्राचीन धार्मिक विश्वासों में अन्तर पढ़े। उनके बहुत से लोग इस्लाम की अनेक घातें मानने लगे। एक जाट ने बातचीत के सिलसिले में मुझसे कहा था- “हम लोग पंजाब के बाहर रहने वाले हैं।"
भारतवर्ष में तैमूर और बाबर के आक्रमण के दिनों में राठीरों ने जाटों को पराजित
किया था। बीका से परास्त होने से पहले जाट लोग कई शताब्दियों से मरुभूमि में रहते थे। बीकानेर राज्य छः भागों में विभाजित है। ये छः भाग इस प्रकार हैं-
1. जोईया
2. पुनिया
3. गोदरा
4. सारन
5. असिम
6. बेनीवाल
जाट जाति के लोग छः शाखाओं में विभाजित थे। उन्हीं के नामों से इन स्थानों के नाम प्रसिद्ध हुए थे। इन छः विभागों के सिवा मौकानेर राज्य के दोन भाग और हैं, जो बागौर, खारो पट्टा और मोहिल के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण बीकानेर राज्य के नौ भाग हैं।
राठौरों ने राज्य के छः भाग जाटों से छोने थे और तीन भाग दूसरे राजपूतों से प्रत्येक भाग बीकानेर राज्य का एक जिला है। ये छ: जिले जो जाटों से छोने गये थे, थोकानेर राज्य के बीच और उत्तरी भाग में हैं। शेष तीन जिले राज्य के दक्षिण और पश्चिम में हैं। उस समय के छः भाग अथवा जिले इस प्रकार हैं-
विभाग ग्राम। परगने
1. पूनिया। 300। भादरा, अजितपुर, सीधमुख, राजगढ़, दारद, साँकू आदि।
2. बेनीवाल। 150। भूरवरखा, सुन्दरी, मनोहरपुर, कूई बाई आदि। जैतपुर, कंवानो, महाजन, पोपसर, उदयपुर आदि।
3. जोईया। 600। जैतपुर, कंवानो, महाजन, पोपसर, उदयपुर आदि।
4. असिध। 150। रावतसर, विरामसर, दादूसर, गुडइली, कोजर, फुआग आदि।
5. सारन 300। बूचावास, सोवाई, चादनू, सिरसिला आदि।
6. गोदरा। 700। पुन्दरासर, गोसेनसर (बड़ा), शेखसर, गडसीसर, गरीबदेसर, रंगोसर, कालू आदि ।
जोड़। 2200
शेष तीन भाग अथवा जिले
7. भागैर। 300। बीकानेर नगर, किला राजासर, सवासर, चतरगढ़,रिनदसिर, बोतनख, भवासीपुर, इत्यादि ।
8. मोहिल 140। चाँपुरा (मोहिलों की राजधानी), सायन्ता, होरासर, गोपालपुर बीदासर, लाडनूं, मलसीसर, खरबूजारा, कोट आदि।
9. खारीपदा। 30..
कुल जोड़। 2670
जोधपुर से चले जाने के बाद कुछ ही वर्षों में बोका को मरुभूमि में इतनी बड़ी सफलता मिली कि वह छब्बीस सौ सत्तर ग्रामों का राजा बन गया। उसका आतंक बढ़ जाने के कारण वहाँ के कितने ही राज्यों ने स्वयं आत्म-समर्पण कर दिया था। लेकिन मुश्किल से तीन शताब्दियों गुजरी होंगो कि बीकानेर राज्य के ग्रामों को संख्या बहुत कम हो गयी। वर्तमान वॉकानेर के राजा सूरतसिंह के शासनकाल में वहाँ के ग्रामों की संख्या तेरह सौ से भी कम रह गयी है।
मरुभूमि में थीका के जाने और वहाँ पर अपने राज्य का विस्तार करने से पहले जो जाट और लोहिया लोग यहाँ रहते थे, वे पशुओं के पालन का व्यवसाय करते थे। वे गायों और पैसों का भी तैयार करके बेचते थे। भेड़ों के बालों को बेचने का व्यवसाय करते थे और अपनी इन चीजों के बदले में थे गेहूँ, चावल इत्यादि खाने की चीजें लिया करते थे।
यह पहले लिखा जा चुका है कि भारतवर्ष की मरुभूमि में रहने वाले जाटों की संख्या बहुत अधिक थी। वे साहसी, लड़ाकू, शूरवीर भी थे। इस प्रकार उनके शक्तिशाली होने के बाद भी राठौरों के द्वारा आसानी से उनकी पराजय के कारण थे। समस्त जाट छः शाखाओं में विभाजित थे। इन वंशों के जाटों में आपसी फूट बहुत बढ़ गयी थी और वे स्वयं एक दूसरे के लिए घातक हो रहे थे। इन्हीं दिनों में बौका ने वहाँ के छोटे-छोटे कितने ही राज्यों को जीत कर अपना आतंक फैला दिया और उसके बाद वह जाट राज्यों की तरफ आगे बढ़ा। जाटों का प्रत्येक वंश अलग-अलग शासन करता था, उनमें आपसी फूट और द्वेष की जानकारी बोका को हो चुकी थी। इसलिए उसने उनकी फूट का सभी प्रकार से लाभ उठाया।
जाटों पर सहज ही राठौरों की सफलता का एक और भी कारण था। बोका के भाई बांदा ने पहले ही मरुभूमि के मोहिलों पर आक्रमण करके उनको पराजित किया था। मोहिलों के साथ बहुत पहले से जाटों की शत्रुता चली आ रही थी। इन मोहिलों ने मरुभूमि में आक्रमण के दिनों में चौका का साथ दिया था, उन मोहिलों के द्वारा बोका को ऐसी बहुत-सी बातों की जानकारी हुई कि जिनका लाभ उठाकर बोका ने जाटों को परास्त किया और अधिकांश जाट वंशी राज्यों ने भयभीत होकर आत्मसमर्पण किया।
वहाँ के जाट राज्यों में जैसलमेर का एक राज्य भी था। वहाँ के भाटी लोग जायें पर अनेक प्रकार के अत्याचार किया करते थे। मोहिलों और भाटी लोगों की शत्रुता के कारण भी विवश और भयभीत होकर जाटों ने चौका की अधीनता स्वीकार कर ली थी।
उन्हीं दिनों में गोदारा के जाटों ने भी अपने राज्य के सम्बन्ध में निर्णय किया था। उन लोगों ने एकत्रित होकर और निर्णय करके अपने दो प्रतिनिधियों को बीका के पास भेज कर आत्म समर्पण करने के लिए निम्नलिखित शर्ते उपस्थित की-
1. जोहिया और दूसरे राज्यों के जो जाट लोग हमारे साथ शत्रुता रखते हैं, उनके अत्याचारों से मीका को हमारी रक्षा करनी होगी।
2. राठौरों को ऐसा प्रबन्ध करना होगा, जिससे हमारे शत्रु भाटो लोग कभी हम लोगों पर आक्रमण नहीं कर सकें।
3. हम लोगों के व्यक्तिगत और सामाजिक स्वत्व सदा सुरक्षित रहेंगे। उनमें कभी किसी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाएगा।
गोदारा के जाटों की इस प्रार्थना को बोका ने स्वीकार कर लिया। उसके बाद वहाँ
के जाटों ने आत्म-समर्पण किया और बीका को अपना राजा मान लिया। वहाँ के जाटों के सम्बन्ध में निर्णय हुआ कि गोदारा के प्रत्येक घर से एक-एक रुपया कर के रूप में लिया जायेगा और वहाँ के प्रत्येक किसान से दो रुपये कर के रूप में लिए जायेंगे। गोदाय के जाटों इन शर्तों को स्वीकार करके राठौरों की अधीनता स्वीकार की।
गोदारा के जाटों को किसी भी अवस्था में बीका के सामने आत्मसमर्पण करना था, क्योंकि बिना किसी आक्रमण और युद्ध के वहाँ के जाटों ने आत्म-समर्पण करने के लिए आपस में निश्चय कर लिया था। उनकी इस निर्बलता का चौका सभी प्रकार लाभ उठा सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और उसने गोदारा के जाटों की माँग को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। राठौरों के उत्तम चरित्र का यह एक सजीव प्रमाण है।
पंजाब के बाहर है"। अधिक क्या करें ? भीकाने मारवाढके जो छः नामधारी जाटोंकी सम्प्रदायका दमन करके केवल अपने अधिकारका विस्तार किया था । उसमें एक सम्प्रदायका नाम असित देखा जाता है । अकसम एवं जतीसती से जो चार जाटों की सम्प्रदायने बेटरियाके मीक राज्यका नाश किया था, उसी सम्प्रदायके नेताका नाम असि था इसी कारण से दोनों में भलीभांति सदृशता विराजमान है। "
कर्नल टाड साहब लिखते हैं कि, तैमूर और पावरके भारतपर अधिकार करने के मध्य समयमें राठौरोंने जाटोंको पराजित किया था । तैमूर चगताई वंशका आदि पुरुष है उसने जाटोंको भारतके मरुक्षेत्र में ट्रेन्स सक्कियानासे भगा दिया ।
इस कारण हम यह सिद्धान्त कर सकते हैं कि मध्य एशिया संसारकी सभी जातिका उत्पत्तिस्थान है । जाट गण बहांसे सिन्धुनीक पूर्वप्रान्तको ओर भाग गये थे। बीकाजीने जिन जाटोंको परास्त किया था उन जाटोंने बहुत शताब्दियोंके पहले यहां आकर निवास किया था।
जाटोंके अधिकारी देशों का विस्तार भी इस सिद्धान्त की पुष्टि करता है, कारण कि बीकानेर राज्यकी सीमाके प्रायः सभी देश नीचे लिखी हुई छः सम्प्रदायों के जाटों से परिपूर्ण हैं:-
१ पूनिया ।
४ अघि ।
२ गोदारा ।
५. बेनीवाल ।
३ सारन ।
६ जोया ।
यद्यपि शेषोत सम्प्रदायको बहुतोंने भाटियों की शाखा कहा है, परन्तु भाटियों के द्वारा पुत्ररूपसे परिपालित हुए जोया गण इस जाट जातिसे उत्पन्न नहीं ये यह भी सिद्धान्त है ।
"बीकानेर के जाटोंकी प्रत्येक सम्प्रदाय के नामसे एक २ विभाग है, और वह प्रत्येक विभाग जिलारूपमें विभक्त है । जाटोंकी वस्तो छः विभागों के अतिरिक्त बागौर, खारी पट्टा और मोहिल नामके राजपूतोंसे छीने हुए और भी तीन विभागों है । यह छः जाट विभाग बीकानेरके मध्य और उत्तरांशमें स्थित है और राजपूत विभाग दक्षिण और पश्चिमकी सीमाम स्थापित है।
उस समय के छः विभाग इस प्रकार हैं ।
विभाग प्रामसंख्या
जिला के नाम ।
९ पूनिया । ३०० भादरां, अजितपुर, सीधमुख, राजगड, दादर, यो सांकू इत्यादि । २ बेनीवाल ।
१३ जोबा ।
४ मसिघ ।
१५० भूखरखा सुन्दरी, मनोहरपुर, कूई बाई इत्यादि । ।
५ सारन ।
६०० जैतपुर, कंबानो, महाजन; पीपसर, उ
दयपुर इत्यादि १५० रावतसर, विरामसर, दादूसर, गुडहली, कोजर, कुभाग।
६ गोदारा । ३०० बूचावास, सोवाई, बादनू सिरसिला इत्यादि । ७०० पुन्दरासर, गोसेनसर, (बढा) शेखसर, गढसीसर, गरीबदेस,
लोड संख्या २२००
(जाटों के प्रदेश)
रंगीसर काळ इत्यादि ।






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